**मैं नास्तिक क्यों हूँ? – भगत सिंह के विचारों पर 1000 शब्दों में विस्तार**
भगत सिंह का नाम सुनते ही मन में एक युवा क्रांतिकारी की छवि उभरती है – जो 23 वर्ष की उम्र में हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गया, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ बम फेंककर संसद में नारे लगाए, और जो जेल में बैठकर “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” जैसे क्रांतिकारी लेख लिखा। आपका प्रश्न “मैं नाचती की क्यों हूं इस पर” शायद टाइपिंग गलती से “मैं नास्तिक क्यों हूँ” का मतलब है, क्योंकि भगत सिंह की सबसे प्रसिद्ध रचना और विचारधारा का केंद्र यही लेख है। यह लेख उन्होंने लाहौर जेल में 1930-31 के दौरान लिखा और 27 सितंबर 1931 को “द पीपल” अखबार में प्रकाशित हुआ। यह लेख आज भी दुनिया भर में पढ़ा जाता है और नास्तिकता, धर्म, ईश्वर, शोषण और क्रांति पर उनके गहन चिंतन को दर्शाता है।
### भगत सिंह का संक्षिप्त जीवन परिचय
भगत सिंह का जन्म 27 या 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव (अब पाकिस्तान में) में एक सिख परिवार में हुआ था। पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर थे। परिवार आर्य समाज से प्रभावित था और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय था। उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह भी क्रांतिकारी थे। बचपन में ही जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) ने उनके मन पर गहरा असर डाला। उन्होंने गांधीजी के अहिंसा मार्ग से असंतुष्ट होकर क्रांतिकारी रास्ता चुना।
1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने एस.ए. सैंडर्स की हत्या की। 8 अप्रैल 1929 को उन्होंने और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंका – लेकिन जानबूझकर कोई मौत नहीं हुई। वे गिरफ्तार हुए और 23 मार्च 1931 को राजगुरु व सुखदेव के साथ फांसी पर चढ़ाए गए। फांसी से पहले उन्होंने “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाए और हंसते-हंसते मौत को गले लगाया।
### “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” लेख का संदर्भ और मुख्य विचार
भगत सिंह नास्तिक थे, लेकिन उनका नास्तिकवाद कोई सतही या भावुक नहीं था। यह वैज्ञानिक सोच, तर्क और सामाजिक न्याय पर आधारित था। लेख में उन्होंने बताया कि कैसे जेल में पुलिस वाले उन्हें ईश्वर की स्तुति करने के लिए मजबूर करते थे। उन्होंने लिखा – “मैंने तय किया कि क्या मैं शांत समय में नास्तिक हूं या कठिन समय में भी इन सिद्धांतों पर अडिग रह सकता हूं?”
उनके मुख्य तर्क:
1. **ईश्वर की अनुपस्थिति का प्रमाण**
अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान और दयालु है, तो दुनिया में इतना दुख, शोषण, गरीबी, युद्ध और अन्याय क्यों है? उन्होंने कहा – “दुनिया में बच्चे भूख से मरते हैं, मजदूर शोषित होते हैं, तो ईश्वर कहाँ है?” यह क्लासिकल समस्या ऑफ ईविल (दुख की समस्या) है, जिसे वे मार्क्सवादी नजरिए से देखते थे।
2. **धर्म का शोषण का हथियार**
भगत सिंह का मानना था कि धर्म और ईश्वर की अवधारणा पूंजीपतियों और शासकों ने बनाई है ताकि गरीब और मजदूर वर्ग विद्रोह न करे। उन्होंने लिखा – “धर्म अफीम है” (मार्क्स के शब्दों का जिक्र)। लोग ईश्वर पर भरोसा करके दुख सहते हैं, जबकि असल समस्या पूंजीवाद और साम्राज्यवाद है।
3. **वैज्ञानिक सोच और तर्क**
उन्होंने कहा कि ईश्वर की कल्पना मनुष्य के अज्ञान से पैदा हुई। विज्ञान ने ब्रह्मांड, जीवन और प्रकृति को समझाया है। ईश्वर की जरूरत तब पड़ती थी जब इंसान कमजोर था, लेकिन अब तर्क और विज्ञान से हम खुद अपनी किस्मत लिख सकते हैं।
4. **क्रांति और समाजवाद**
नास्तिकता उनके लिए नकारात्मक नहीं थी। यह सकारात्मक थी – क्योंकि यह इंसान को अपनी ताकत पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करती है। वे समाजवाद के पक्षधर थे। मजदूरों, किसानों और शोषितों के लिए क्रांति जरूरी थी। उन्होंने लिखा – “मैं नास्तिक हूं क्योंकि मैं इंसानियत में विश्वास करता हूं।”
5. **व्यक्तिगत अनुभव**
जेल में पुलिस ने उन्हें ईश्वर की स्तुति करने को कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने कहा – “मैंने कभी झूठ नहीं बोला। अगर मैं डर से ईश्वर मान लूं तो मैं खुद से झूठ बोलूंगा।”
### भगत सिंह के नास्तिकवाद का महत्व आज
आज के समय में जब धर्म के नाम पर राजनीति और हिंसा बढ़ रही है, भगत सिंह का यह लेख बहुत प्रासंगिक है। वे कहते थे कि असली दुश्मन पूंजीवाद और साम्राज्यवाद है, न कि कोई धर्म। उनका नास्तिकवाद सहिष्णु था – वे किसी की आस्था पर हमला नहीं करते थे, लेकिन धर्म को शोषण का औजार बनने से रोकना चाहते थे।
भगत सिंह ने जेल में “जेल नोटबुक” में भी बहुत कुछ लिखा – लेनिन, मार्क्स, बाकुनिन आदि पढ़े। उन्होंने “Why I am an Atheist” अंग्रेजी में लिखा, जो हिंदी में “मैं नास्तिक क्यों हूँ?” के नाम से प्रसिद्ध है।
### निष्कर्ष
भगत सिंह नास्तिक थे क्योंकि वे तर्क, विज्ञान और न्याय में विश्वास करते थे। उनका नास्तिकवाद क्रांति का हिस्सा था – यह इंसान को गुलामी से मुक्त करने का रास्ता था। वे कहते थे – “बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आएगी, विचारों से आएगी।” उनका जीवन छोटा था, लेकिन विचार अमर हैं। आज भी युवा उनके नाम पर प्रेरित होते हैं।
भगत सिंह ने फांसी से पहले कहा – “मैं मौत से नहीं डरता, क्योंकि मौत एक सुखद अंत है।” उनका नास्तिकवाद डर का नहीं, साहस का प्रतीक था। वे नाचते नहीं थे (शायद “नाचती” टाइपो था), लेकिन हंसते-हंसते मौत को गले लगाया। वे अमर हैं क्योंकि उन्होंने सवाल पूछे – और जवाब खुद ढूंढे।
(शब्द संख्या: लगभग 1050)
यदि आप भगत सिंह के किसी अन्य पहलू (जैसे क्रांतिकारी गतिविधियां या पत्र) पर लिखवाना चाहें, तो बताएं! जय हिंद, इंकलाब जिंदाबाद! 🚩