**सुकरात (Socrates) के बारे में विस्तार से**
सुकरात (Socrates) प्राचीन यूनान के सबसे महान दार्शनिकों में से एक थे। वे **पश्चिमी दर्शन** के जनक माने जाते हैं और **प्लेटो** तथा **अरस्तु** के साथ मिलकर प्राचीन यूनानी दर्शन की तिकड़ी (Socrates-Plato-Aristotle) बनाते हैं। सुकरात ने कभी कोई किताब नहीं लिखी, लेकिन उनके विचार उनके शिष्य **प्लेटो** के संवादों (Dialogues) में संरक्षित हैं, विशेषकर **Apology**, **Crito**, **Phaedo** और **Symposium** जैसे कार्यों में। उनका जीवन, शिक्षण शैली (**सुकराती विधि**), नैतिकता पर जोर और **अथेंस** में हुई मुकदमेबाजी व मृत्यु ने उन्हें अमर बना दिया।
### जीवन परिचय और पृष्ठभूमि
सुकरात का जन्म **लगभग 469 ईसा पूर्व** (या 470 ईसा पूर्व) में **अथेंस** में हुआ था। उनके पिता **सोफ्रोनिस्कस** एक मूर्तिकार (stonecutter/sculptor) थे और माता **फैनारेते** एक दाई (midwife) थीं। परिवार मध्यम वर्ग का था। सुकरात ने युवावस्था में सैनिक के रूप में सेवा की – **पोटिडिया**, **डेलियम** और **एम्फिपोलिस** की लड़ाइयों में बहादुरी दिखाई।
वे अथेंस के **स्वर्ण युग** (Pericles के समय) में बड़े हुए, जब शहर लोकतंत्र, कला और दर्शन का केंद्र था। लेकिन सुकरात लोकतंत्र के आलोचक थे – वे मानते थे कि आम जनता (masses) खुद को शासित करने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान नहीं है, और सत्ता ज्ञानी लोगों (wise shepherd) के हाथ में होनी चाहिए।
### सुकराती विधि (Socratic Method)
सुकरात की सबसे बड़ी देन **सुकराती विधि** (Socratic Method या Elenchus) है – यह प्रश्न-उत्तर की एक प्रक्रिया है जिसमें वे लोगों से सवाल पूछते थे ताकि वे खुद अपनी धारणाओं की गहराई में जाएँ और विरोधाभास (contradictions) देखें।
उदाहरण:
– कोई कहता है: “न्याय का मतलब मजबूत की मदद करना है।”
– सुकरात पूछते: “क्या मजबूत हमेशा सही होता है? अगर मजबूत व्यक्ति गलत हो तो?”
– वे बार-बार सवाल पूछकर व्यक्ति को अपनी अज्ञानता का एहसास कराते।
उनका प्रसिद्ध कथन: **”मैं जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता”** (I know that I know nothing)।
दिल्फी के मंदिर के देवता (Oracle of Delphi) ने कहा था कि कोई भी सुकरात से अधिक बुद्धिमान नहीं है। सुकरात ने सोचा कि यह इसलिए क्योंकि वे अपनी अज्ञानता स्वीकार करते हैं, जबकि दूसरे लोग झूठे ज्ञान का दावा करते हैं।
### दर्शन और मुख्य विचार
सुकरात ने ब्रह्मांड या प्रकृति (pre-Socratic philosophers की तरह) के बजाय **मानव जीवन और नैतिकता** (ethics) पर फोकस किया। उनके मुख्य विचार:
– **सद्गुण ज्ञान है** (Virtue is knowledge): कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत नहीं करता। बुराई अज्ञान से होती है। अगर कोई सही-गलत जान ले, तो वह अच्छा ही करेगा।
– **आत्मा की देखभाल** (Care of the soul): सबसे महत्वपूर्ण काम आत्मा को बेहतर बनाना है – ज्ञान, नैतिकता और सद्गुण से।
– **अनैतिक जीवन जीने लायक नहीं** (The unexamined life is not worth living): जीवन की जाँच-पड़ताल करनी चाहिए।
– **ईश्वर और नैतिकता**: वे अथेंस के देवताओं को नहीं मानते थे (impiety का आरोप), लेकिन एक उच्च नैतिक सिद्धांत में विश्वास रखते थे।
वे राजनीति में लोकतंत्र के विरोधी थे – मानते थे कि जनता अक्सर भावनाओं से चलती है, न कि तर्क से।
### मुकदमा और मृत्यु (Trial and Death, 399 BCE)
399 ईसा पूर्व में सुकरात पर दो मुख्य आरोप लगे:
1. **असेबिया** (Impiety): अथेंस के देवताओं को न मानना और नए देवताओं को लाना।
2. **युवाओं को भ्रष्ट करना** (Corrupting the youth): युवाओं को बुरा प्रभाव देना और अराजकता फैलाना।
अभियुक्त: **मेलेतुस** (एक कवि), **अनाइटस** (एक राजनीतिज्ञ) और **लायकॉन**।
**प्लेटो** के **Apology** में सुकरात का बचाव वर्णित है। उन्होंने कहा:
– वे शहर के लिए “गैडफ्लाई” (gadfly) हैं – जैसे मक्खी घोड़े को जगाती है, वैसे वे अथेंस को जागृत करते हैं।
– वे माफी नहीं माँगेंगे – सत्य के लिए मरना बेहतर है।
– जूरी ने उन्हें दोषी ठहराया (280-221 वोट से)।
– सजा पर बहस में उन्होंने मजाक में जुर्माना लगाया, लेकिन जूरी ने **हेमलॉक** (विष) से मौत की सजा दी।
**Crito** में उनके दोस्त क्रिटो ने जेल से भागने का प्रस्ताव दिया, लेकिन सुकरात ने मना कर दिया – कानून का सम्मान करना जरूरी है।
**Phaedo** में अंतिम दिन उन्होंने हेमलॉक पिया, शांतिपूर्वक मित्रों से बात की और मरते हुए कहा: “क्रिटो, हम एस्क्लेपियस को एक मुर्गा चढ़ाना भूल गए थे – कर्ज चुकाना।”
### विरासत
– सुकरात ने कभी लिखा नहीं, लेकिन **प्लेटो** और **ज़ेनोफ़न** ने उनके विचार संरक्षित किए।
– उनकी विधि आज भी शिक्षा, कानून और दर्शन में इस्तेमाल होती है।
– वे **पश्चिमी दर्शन** के संस्थापक हैं – नैतिकता, आत्म-जाँच और सवाल पूछने की परंपरा शुरू की।
– उनकी मौत को **दर्शन की शहादत** माना जाता है – सत्य के लिए जान देने का प्रतीक।
सुकरात का जीवन संदेश है: **”अनपरीक्षित जीवन जीने लायक नहीं है।”** वे अज्ञानता स्वीकार करने और सत्य की खोज में लगे रहने के प्रतीक हैं। आज भी वे दर्शनशास्त्र के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं।
(शब्द संख्या: लगभग 1050)
यदि सुकराती विधि, मुकदमा या उनके विचारों पर अधिक विस्तार चाहिए, तो बताएं!